
पवन नागर
रसायन छोड़ो, मिट्टी से नाता जोड़ो
आज का किसान कठिन दौर से गुज़र रहा है। एक ओर बढ़ती लागत, दूसरी ओर घटती उपज की गुणवत्ता, और तीसरी ओर बिगड़ता स्वास्थ्य – इन तीनों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि गलती कहाँ हुई? उत्तर साफ है – हमने मिट्टी से रिश्ता तोड़ लिया और रसायनों से दोस्ती कर ली।
हरित क्रांति ने देश को भूख से तो बचाया, लेकिन रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता ने खेत, किसान और भोजन; तीनों को बीमार बना दिया। शुरुआत में उपज बढ़ी, पर धीरे-धीरे मिट्टी की जीवंतता समाप्त होती गई। आज हालत यह है कि खेत को उपजाऊ बनाए रखने के लिए हर साल अधिक मात्रा में खाद डालनी पड़ती है, फिर भी परिणाम पहले जैसे नहीं मिलते।

मिट्टी केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि जीवित तंत्र है। उसमें केंचुए, सूक्ष्म जीव, जैविक तत्व और प्राकृतिक संतुलन होता है। रसायन इस तंत्र को नष्ट कर देते हैं। कीटनाशक केवल कीट नहीं मारते, बल्कि मित्र कीटों, जीवाणुओं और मिट्टी की संरचना को भी खत्म कर देते हैं। परिणामस्वरूप खेत बंजर होने की ओर बढ़ता है और किसान कर्ज की ओर।
मिट्टी वह अनमोल धरोहर है जो जीवन की नींव है। यह न केवल फसलों का आधार है, बल्कि पूरी पृथ्वी की पारिस्थितिकी का मूल है। सदियों से मिट्टी ने हमें पोषित किया है, लेकिन आधुनिक कृषि प्रथाओं, विशेषकर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से इसकी सेहत बिगड़ रही है। “रसायन छोड़ो, मिट्टी से नाता जोड़ो” का नारा आज की आवश्यकता है, क्योंकि मिट्टी का महत्व सिर्फ कृषि तक सीमित नहीं है – यह हमारी सेहत, पर्यावरण और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा है। इस लेख में हम मिट्टी के महत्व पर चर्चा करेंगे, उसकी सेहत सुधारने के तरीकों पर विचार करेंगे, और समझेंगे कि मिट्टी सुधार क्यों उत्पादन बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए अनिवार्य है।
मिट्टी का महत्व समझने के लिए हमें उसके मूल स्वरूप को जानना होगा। मिट्टी एक जीवंत प्रणाली है, जिसमें खनिज, कार्बनिक पदार्थ, पानी, हवा और असंख्य सूक्ष्मजीव शामिल हैं। ये असंख्य सूक्ष्मजीव—बैक्टीरिया, केंचुए आदि—मिट्टी को उर्वर बनाते हैं। वे पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों—नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम—को उपलब्ध कराते हैं। मिट्टी का महत्व कृषि में सर्वोपरि है; यह फसलों की जड़ों को सहारा देती है, पानी और पोषक तत्वों को संग्रहित करती है, और फसल उत्पादन को सुनिश्चित करती है। बिना स्वस्थ मिट्टी के कोई भी फसल स्वस्थ नहीं उग सकती। विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, दुनिया का 95% से अधिक भोजन मिट्टी से ही आता है।
इसके अलावा, मिट्टी पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह कार्बन सिंक के रूप में कार्य करती है, अर्थात वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद करती है। मिट्टी जल-चक्र को नियंत्रित करती है, वर्षा जल को सोखकर भूजल स्तर बनाए रखती है और बाढ़ को रोकती है। जैव विविधता के लिए भी मिट्टी आवश्यक है; यह असंख्य जीवों, जो कीटों से लेकर पक्षियों तक की खाद्य श्रृंखला को बनाए रखते हैं, का निवास स्थान है। भारत जैसे देश में, जहाँ कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, मिट्टी का महत्व और बढ़ जाता है। यहाँ की मिट्टी विविध है—काली मिट्टी, लाल मिट्टी, जलोढ़ मिट्टी—प्रत्येक अपनी विशेषताओं के साथ फसलों को पोषित करती है। लेकिन रासायनिक खेती ने इस महत्व को खतरे में डाल दिया है।
अब बात करते हैं मिट्टी की सेहत सुधारने के तरीकों की
मिट्टी की सेहत बिगड़ने के मुख्य कारण हैं – रासायनिक उर्वरकों का अधिक उपयोग, गहन जुताई, मोनोक्रॉपिंग (एक ही फसल बार-बार उगाना) और प्रदूषण। इनसे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ कम होते हैं, पीएच असंतुलित होता है, और सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं।
सेहत सुधारने के लिए पहला कदम है – प्राकृतिक तरीकों को अपनाना। सबसे प्रभावी है कार्बनिक खाद का उपयोग – गोबर खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद (जैसे ढैंचा, सनई)। ये मिट्टी में कार्बन बढ़ाते हैं और सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देते हैं। फसल-चक्र अपनाएँ – अनाज, दलहन और तिलहन को बारी-बारी से उगाएँ, ताकि मिट्टी के पोषक तत्व संतुलित रहें।
दूसरा कदम है – न्यूनतम जुताई या जीरो टिलेज अपनाएँ। बार-बार जुताई से मिट्टी की संरचना बिगड़ती है और कार्बनिक पदार्थ हवा में उड़ जाते हैं। इसके बजाय मल्चिंग करें – फसल अवशेषों या पत्तियों से मिट्टी को ढकें, जिससे नमी बरकरार रहती है और खरपतवार नियंत्रण भी हो जाता है। जीवामृत और घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक घोलों का छिड़काव करें, जो देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से बनते हैं। ये मिट्टी में लाभकारी बैक्टीरिया बढ़ाते हैं। वर्षा जल संरक्षण के लिए कंटूर फार्मिंग या टेरेसिंग करें, जो मिट्टी के कटाव को रोकती है। वर्मीकम्पोस्टिंग—केंचुओं से कम्पोस्ट बनाना—एक सरल तरीका है, जो मिट्टी को पोषक बनाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध है कि इन तरीकों से मिट्टी की उर्वरता 20-30% तक बढ़ सकती है। भारत सरकार की योजनाएँ, जैसे कि सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम किसानों को मिट्टी परीक्षण और सुधार के लिए सहायता प्रदान करती हैं।
मिट्टी सुधार क्यों आवश्यक है?
सबसे पहले, उत्पादन के लिए। स्वस्थ मिट्टी से फसलें मज़बूत होती हैं, रोग कम लगते हैं, और उत्पादन बढ़ता है। रासायनिक खेती में शुरुआत में उत्पादन बढ़ता है, लेकिन लंबे समय में मिट्टी थक जाती है, और अधिक रसायनों की ज़रूरत पड़ती है। FAO के अनुसार, दुनिया में 33% मिट्टी डिग्रेडेड है, जिससे उत्पादन में 20% तक कमी आ सकती है। भारत में पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में मिट्टी की सेहत बिगड़ने से गेंहू और चावल का उत्पादन स्थिर हो गया है। मिट्टी सुधार से प्रति हेक्टेयर उपज 10-15% बढ़ सकती है, बिना अतिरिक्त लागत के। यह किसानों की आय बढ़ाएगा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
पर्यावरण के लिए मिट्टी सुधार और भी ज़रूरी है। डिग्रेडेड मिट्टी से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो ग्लोबल वॉर्मिंग का कारण बनता है। स्वस्थ मिट्टी कार्बन को संग्रहित करती है, जिससे जलवायु परिवर्तन कम होता है। मिट्टी कटाव के चलते नदियाँ गाद से भर जाती हैं, बाढ़ बढ़ती है, और जैव विविधता घटती है। रासायनिक अपवाह से जल स्रोत प्रदूषित होते हैं, जो मछलियों और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। मिट्टी सुधार से हम जल संरक्षण कर सकते हैं—स्वस्थ मिट्टी अधिक पानी सोखती है, सूखा प्रतिरोध बढ़ाती है। संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स में मिट्टी संरक्षण को प्रमुख स्थान दिया गया है। भारत में गंगा जैसे नदियों की सफाई के लिए मिट्टी सुधार आवश्यक है, क्योंकि कृषि अपवाह प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।
इसके अलावा, मिट्टी सुधार मानव स्वास्थ्य से जुड़ा है। स्वस्थ मिट्टी से उगी फसलें पौष्टिक होती हैं, जबकि रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों वाली फसलें बीमारियाँ फैलाती हैं। कैंसर, मधुमेह और एलर्जी जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से, मिट्टी सुधार जैव विविधता बढ़ाता है—अधिक सूक्ष्मजीव, अधिक कीट और अधिक पक्षी। यह टिकाऊ विकास का आधार है। यदि हम मिट्टी को नज़रअंदाज करेंगे, तो 2050 तक दुनिया में खाद्य संकट आ सकता है, जैसी कि वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं।
मिट्टी का महत्व समझकर हमें कार्रवाई करनी होगी। घरेलू बागवानी में कार्बनिक खाद का उपयोग जैसे छोटे कदम हों, या किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, सब तरह से प्रयास करने होंगे। सरकार, एनजीओ और किसान मिलकर मिट्टी दिवस (5 दिसंबर) जैसे अवसरों पर जागरूकता फैलाएँ। प्रौद्योगिकी का उपयोग करें—ड्रोन से मिट्टी मैपिंग, या ऐप से सेहत परीक्षण।
आखिर में…
किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करते हुए कहना चाहूँगा कि यही समाधान है। प्राकृतिक खेती से मिट्टी की सेहत स्वाभाविक रूप से सुधरती है, लागत घटती है, और उत्पादन टिकाऊ बनता है। जीवामृत, फसल चक्र और मल्चिंग जैसे तरीके अपनाकर हम रसायनों से मुक्ति पा सकते हैं। सरकार की नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग जैसी योजनाएँ सहायता प्रदान करती हैं। प्राकृतिक खेती अपनाएँ, क्योंकि यह न केवल हमारी मिट्टी और पर्यावरण को बचाएगी, बल्कि हमें स्वस्थ व समृद्ध भविष्य भी देगी।
हमें चाहिए कि मिट्टी की उस प्राकृतिक व्यवस्था में विश्वास करें जिससे पूरी सृष्टि का आधार चल रहा है, जिससे करोड़ों वर्षों से मिट्टी इस धरती पर जीवन का संतुलन बनाए हुए है, वो भी बिना किसी आधुनिकता और तकनीक के। मिट्टी की व्यवस्था में लालच का कोई स्थान है ही नहीं। इस व्यवस्था में तो ‘संतोषम् परम् सुखम्’ की भावना के साथ जिया जाता है। आप ध्यान दें कि जंगल की मिट्टी में किस प्रकार जीवन-चक्र चल रहा है। वहाँ तो सुविधाभोग के कोई साधन नहीं हैं, कोई तकनीक नहीं है। न ही कोई अस्पताल है, न ही कोई नगर निकाय है, न ही कोई शासक है। फिर भी वहाँ सभी जीवों का जीवन सुचारू रूप से चल रहा है और मिट्टी हमेशा उर्वर व स्वच्छ बनी रहती है, बिना किसी आधुनिकता और तकनीक के। हमारे पास तो कितनी तकनीक है, कितने मानव संसाधन हैं, फिर भी हमने मिट्टी का क्या हाल कर दिया है। हमने रासायनिक खादों और कीटनाशकों से मिट्टी को ज़हरीला कर दिया है, उसकी उर्वरता छीन ली है, कार्बनिक पदार्थ कम कर दिए हैं। जंगलों को काटकर हमने मिट्टी के प्राकृतिक आवरण को नष्ट कर दिया है। आप ही विचार कीजिए कि इतनी तकनीक, आधुनिकता और बुद्धि होने के बाद भी हम बेहतर हैं या जंगलों की वह प्राकृतिक मिट्टी बेहतर है? ऐसी आधुनिकता का भी क्या फायदा जो हमारे जीवन के आधार मिट्टी को ही संकट में डाल दे।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि रसायनों का असर खेत से निकलकर हमारी थाली तक पहुँच चुका है। कैंसर, मधुमेह, हॉर्मोनल असंतुलन जैसी बीमारियाँ कहीं न कहीं ज़हरीले भोजन से जुड़ी हैं। प्रश्न यह नहीं कि हम कितना पैदा कर रहे हैं, प्रश्न यह है कि हम क्या खा रहे हैं।
ऐसे समय में प्राकृतिक खेती और जैविक खेती केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी हैं। गोबर, गोमूत्र, जीवामृत, घनजीवामृत, फसल चक्र, हरी खाद और देशी बीज – ये सब हमारे पारंपरिक ज्ञान का हिस्सा रहे हैं। आज वही ज्ञान आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी खरा उतर रहा है।
रसायन छोड़ना केवल खेती का निर्णय नहीं, यह जीवन का निर्णय है।मिट्टी से नाता जोड़ना मतलब भविष्य को सुरक्षित करना – अपने बच्चों के लिए, अपने स्वास्थ्य के लिए और इस धरती के लिए।
तो साथियो! इस कष्ट से बचने का और आगे आने वाली पीढ़ियों को समस्याओं से बचाने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि हम सब मिलकर मिट्टी की सेहत सुधारने में सहयोग करें। अपने लालच के लिए मिट्टी की प्राकृतिक संरचना को बर्बाद करना बंद करें, रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग रोकें, और मिट्टी से जो ले रहे हैं उसे वापस मिट्टी को लौटाने की नीयत रखें, तभी हम सबको मिट्टी की बंजरता से निजात मिलेगी, सूखे और बाढ़ जैसी आपदाओं से निजात मिलेगी, और बीमारियों से निजात मिलेगी। इस बात का ध्यान हमेशा रखें कि हमें मिट्टी को नुकसान पहुँचाने वाला कोई कार्य नहीं करना है, फिर चाहे आप किसी भी व्यवसाय या खेती में क्यों न हों। यह दृढ़ निश्चय हर व्यक्ति को करना होगा कि “रसायन छोड़ो और मिट्टी से नाता जोड़ो”।
पवन नागर,
सम्पादक




