संपादकीय

युद्ध, जलवायु संकट और खेती का भविष्य

युद्ध, जलवायु संकट और खेती का भविष्य

पवन नागर

वर्तमान समय में दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ एक ओर विज्ञान और तकनीक नई ऊँचाइयों को छू रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानवता युद्ध, पर्यावरणीय संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध, इज़राइल-हमास संघर्ष, मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, लाल सागर क्षेत्र में अस्थिरता तथा विश्व के विभिन्न हिस्सों में चल रहे सैन्य संघर्षों ने केवल राजनीतिक और आर्थिक असंतुलन ही पैदा नहीं किया है, बल्कि पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव डाला है।

युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, उनका असर खेतों तक पहुँचता है। बमों और मिसाइलों से निकलने वाला धुआँ, सैन्य गतिविधियों में होने वाला भारी ईंधन उपयोग, जंगलों की आग, जल स्रोतों का प्रदूषण और कृषि भूमि का विनाश वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ाते हैं। इसका परिणाम वैश्विक तापमान वृद्धि, असामान्य वर्षा, सूखा, बाढ़ और मौसम के बदलते स्वरूप के रूप में सामने आता है।

दुनिया के कई वैज्ञानिक संस्थानों ने चेतावनी दी है कि यदि मानव गतिविधियों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन और भी गंभीर रूप ले सकता है। इस संकट का सबसे अधिक प्रभाव उस वर्ग पर पड़ता है जो प्रकृति पर सबसे अधिक निर्भर है—किसान।

बदल रहा है मौसम का मिजाज

कुछ दशक पहले तक किसान मौसम के संकेतों को देखकर काफी हद तक खेती की योजना बना लेते थे। वर्षा का समय लगभग निश्चित होता था, तापमान का उतार-चढ़ाव सीमित था और प्राकृतिक चक्र अपेक्षाकृत संतुलित था।लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है।

कहीं अचानक अत्यधिक वर्षा हो रही है, तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। कभी ओलावृष्टि फसल को नुकसान पहुँचा देती है, तो कभी असामयिक बारिश कटाई के समय किसानों की मेहनत पर पानी फेर देती है। गर्मी के रिकॉर्ड टूट रहे हैं और सर्दी का स्वरूप भी बदल रहा है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह परिवर्तन केवल मौसम का नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आजीविका का प्रश्न बन चुका है।

क्या केवल मौसम जिम्मेदार है?

अक्सर हम सारी समस्याओं का कारण मौसम को मान लेते हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल मौसम जिम्मेदार है?

सच्चाई यह है कि हमने स्वयं भी खेती की उस दिशा को अपनाया है जिसने मिट्टी, पानी और पर्यावरण पर दबाव बढ़ाया है। पिछले कई दशकों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग लगातार बढ़ा है। इससे प्रारंभिक वर्षों में उत्पादन बढ़ा, लेकिन धीरे-धीरे मिट्टी की जैविक शक्ति कमजोर होने लगी।

मिट्टी केवल धूल का ढेर नहीं होती। यह करोड़ों सूक्ष्मजीवों, केंचुओं, कार्बनिक पदार्थों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं का जीवित संसार है। जब लगातार रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है तो मिट्टी की यह जीवंतता प्रभावित होती है।

परिणामस्वरूप—

•             मिट्टी का जैविक कार्बन कम होता है।

•             पानी रोकने की क्षमता घटती है।

•             पौधों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है।

•             उत्पादन लागत बढ़ती जाती है।

•             किसान बाहरी संसाधनों पर अधिक निर्भर हो जाता है।

मिट्टी को समझना ही खेती को समझना है

आज आवश्यकता इस बात की है कि किसान केवल फसल को नहीं, बल्कि मिट्टी को समझे। जिस खेत की मिट्टी स्वस्थ होती है, वह सूखे और अधिक वर्षा दोनों परिस्थितियों का बेहतर सामना कर सकती है। मिट्टी में पर्याप्त जैविक कार्बन होने पर वह स्पंज की तरह पानी को रोककर रखती है। इससे कम सिंचाई में भी फसल बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।

कई प्रगतिशील किसानों के अनुभव बताते हैं कि जैविक पदार्थों से समृद्ध खेतों में पानी की आवश्यकता कम होती है और फसल तनाव की स्थिति में भी बेहतर रहती है।मिट्टी की देखभाल भविष्य की खेती में निवेश के समान है।

पानी का महत्व पहले से अधिक

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पानी सबसे महत्वपूर्ण संसाधन बनता जा रहा है।आज वर्षा की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसका वितरण है। कई बार पूरे सीजन की बारिश कुछ ही दिनों में हो जाती है, जबकि बाकी समय खेत सूखे रहते हैं।

ऐसी स्थिति में वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, मेड़बंदी, मल्चिंग, जैविक पदार्थों का उपयोग और जल संरक्षण तकनीकें अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।जिस किसान ने पानी को बचाना सीख लिया, उसने भविष्य की खेती की एक बड़ी चुनौती पर विजय प्राप्त कर ली।

प्रकृति विरोधी नहीं, प्रकृति सहयोगी खेती

प्रकृति को हराने की कोशिश कभी सफल नहीं हो सकती। खेती का भविष्य प्रकृति से संघर्ष में नहीं, बल्कि उसके साथ सहयोग में है।प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और कम लागत वाली टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ इसी दिशा में प्रयास हैं। इनका उद्देश्य केवल रसायन छोड़ना नहीं है, बल्कि मिट्टी, पानी, जैव विविधता और किसान की आर्थिक स्थिति के बीच संतुलन स्थापित करना है।

जब खेत में विविधता बढ़ती है, जब मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ते हैं, जब लाभकारी जीवों को संरक्षण मिलता है, तब खेती अधिक स्थिर और टिकाऊ बनती है।

किसानों से सीखने की आवश्यकता

देशभर में अनेक किसान ऐसे हैं जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए हैं। उन्होंने मिट्टी को सुधारा, लागत घटाई, रसायनों पर निर्भरता कम की और प्रकृति आधारित उपायों को अपनाया। ऐसे किसानों की ग्राउंड रिपोर्ट केवल सफलता की कहानी नहीं होती, बल्कि भविष्य की दिशा भी दिखाती है।आज आवश्यकता है कि किसान एक-दूसरे के अनुभवों से सीखें, खेतों का भ्रमण करें, संवाद बढ़ाएँ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान विकसित करें।

खेती का भविष्य केवल उत्पादन नहीं

आने वाले समय में खेती की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि खेत से कितना उत्पादन निकला।

सफलता का नया पैमाना होगा—

•             मिट्टी कितनी स्वस्थ है।        

•           पानी कितना बचाया गया।

•             उत्पादन लागत कितनी कम हुई।        

•           किसान कितना आत्मनिर्भर बना।

•             भोजन कितना सुरक्षित और पोषक है।

यदि उत्पादन बढ़े लेकिन मिट्टी कमजोर हो जाए, पानी खत्म हो जाए और किसान कर्ज में डूब जाए, तो ऐसी व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती।

ज़हरमुक्त अन्न की ओर बढ़ने का समय

आज जब दुनिया युद्ध, प्रदूषण और जलवायु संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब खेती को भी नई दिशा देने की आवश्यकता है। हमें ऐसी कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जो मिट्टी को जीवित रखे, पानी का संरक्षण करे, पर्यावरण का सम्मान करे और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भोजन प्रदान करे।

यह यात्रा एक दिन में पूरी नहीं होगी। लेकिन हर किसान यदि अपनी परिस्थितियों के अनुसार रासायनिक निर्भरता कम करने, मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने, पानी बचाने और प्रकृति आधारित उपायों को अपनाने की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाए, तो बड़ा परिवर्तन संभव है।

अंततः याद रखना होगा कि बदलते मौसम में वही किसान सफल होगा जो मिट्टी, पानी और प्रकृति को समझकर खेती करेगा।और जब खेतों में ज़हर कम होगा, मिट्टी स्वस्थ होगी, पानी सुरक्षित होगा और अन्न शुद्ध होगा, तभी हमारा समाज भी स्वस्थ और समृद्ध बन सकेगा।

जब होगा ज़हरमुक्त अन्न हमारा, तब होगा ज़हरमुक्त समाज हमारा।

पवन नागर, सम्पादक

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